उन्माद पर मौन स्वीकृति...



जगजीत सिंह भाटिया

प्रधान संपादक
जवाबदेही समाचार पत्र

पवित्रता रिश्तों में ही ढूंढी जाती है और पवित्र रिश्ता धर्म और इंसानियत से होकर मजबूत बनता है। वर्तमान में जिस तरह से हिंदुओं को नीचा दिखाने के लिए कथित मुस्लिमों द्वारा षड््यंत्र रचा जा रहा है वो किसी भी हालत में किसी धर्म का हिस्सा हो ही नहीं सकता। क्योंकि कोई भी धर्म सिर्फ इंसानियत का पाठ पढ़ाता है, लेकिन वर्तमान में अपने आपको पाक-साफ बताकर जो घृणित काम किया जा रहा है, उसके लिए ईश्वर, अल्लाह जो सब एक है, कभी माफ नहीं करेंगे। संदिग्ध आतंकी सम्पर्कों वाले कुछ मौलाना बेसहारा लोगों को, दिव्यांग लोगों को कलमा पढ़ाने में और हिन्दू धर्म से, सनातन संस्कृति से नफरत बढ़ाने में जुटे हैं।  हिंदुओं को उनकी मूल आस्था से काटने में लगे लोग बड़ी संख्या में धर्मांतरण कराकर एक जिहाद कर रहे हैं। महाराष्ट्र में, केरल में, हरियाणा में, उत्तर प्रदेश में, आंध्र प्रदेश में, हर स्थान पर यह सिलसिला चल रहा है। और समाज के कई तबके इनके निशाने पर हैं। इनकी समझ क्या है, ये ऐसा क्यों कर रहे हैं, इस पर भी समाज सवाल उठाएगा क्योंकि किसी भी सभ्य समाज में यह स्वीकार्य नहीं हो सकता। आखिर कन्वर्जन किसके लिए? केवल संख्या बढ़ाने के लिए, उन लोगों की बेहतरी के लिए या जिस आस्था का आप प्रचार कर रहे हैं, उसके बारे में बताने के लिए? अगर उसमें ताकत होती तो उसके बारे में बताते लेकिन इसके बजाय निशाने पर कमजोर वर्ग और गरीब लोग हैं? इसका अर्थ यह है कि विचार में इतनी शक्ति नहीं कि सन्तुलित, तार्किक बात करने वाले स्वस्थ व्यक्तियों को इस्लाम की घुट्टी पिलाना/कन्वर्ट करना सम्भव हो।ये किसी को अपनी आस्था में शामिल नहीं कर रहे बल्कि कमजोर का शिकार करने वाली मध्ययुगीन कबीलाई मानसिकता से अबतक बाहर नहीं निकल पाए हैं। भाईचारे की बात करने वालों के लिए गरीब, कमजोर, लाचार, दिव्यांग इस्लाम का ‘चारा’ भर है। ये बात आपको समझनी होगी। इन घटनाओं से खुद मुस्लिम जगत की बड़ी कमजोरी उजागर होती है। अब यह किसी से छिपा नहीं है कि मुस्लिम जगत की अगुवाई मुस्लिम सिविल सोसाइटी के हाथ में नहीं है, इनकी कमान आतंक का पोषण करने वालों, अधकचरी जानकारी रखने वालों, विज्ञान पर भरोसा ना करने वालों के हाथ में चली गई है। इस पर खामोशी है, कोई मातम नहीं है। यानी क्या! यही की इस उन्माद पर मुस्लिम समाज की मौन सहमति है और समाजिक चेतना कठमुल्लों की दहलीज पर मरणासन्न पड़ी है।