राजा की निकली सवारी, किया आदेश जारी

 

  • जनता का खलल नहीं हुआ बर्दाश्त
  • तुगलकी आदेश कर दिया जारी
  • जनता भूखी मरे तो मरे
  • लोकतंत्र है या राजतंत्र?

जवाबदेही. इंदौर

20 मई को राजा साहब की सवारी इंदौर से निकली, जाहिर सी बात है कि जब भी कोई राजा निकलता है तो (प्रोटोकाल) के तहत रास्ते में जनता नहीं आनी चाहिए, लेकिन राजा साहब को जनता सड़क किनारे दिखाई पड़ गई और नाराजगी की गाज भी जनता पर ही गिरा दी.... और तत्काल राजासाहब ने जनता को 10 दिन के लिए कड़ा दंड दे दिया कि कोई भी घर से ना निकले, अन्यथा कड़ी कार्रवाई होगी। वो बात अलग है कि राजा को तो हमने ही चुना है..., और एक बार तो राजा को जनता पटखनी दे ही चुकी हैं...फिर मौका जनता के हाथ आने वाला है, खैर ये तो समय बताएगा।

कोरोना जैसी आपदा की स्थिति में जिस तरह के आदेश जारी किए जा रहे हैं क्या ये लोकतंत्र को ध्यान में देकर जारी किए जा रहे हैं या फिर राजतंत्र को ध्यान में रखकर।  सबकुछ सामान्य हो चला था, जैसे-तैसे जनजीवन पटरी पर लौटने लगा था।  प्रदेश के मुखिया शिवराजसिंह चौहान 20 मई को अफसरों की पीठ थपथपाने इंदौर आए और क्राइसिस कमेटी की बैठक में इंदौर की तारीफ की गई और इसके लिए अफसरों को ही काबिल समझा गया! दुखद ये कि अगर हालात बिगड़े तो ठिकरा अफसरों और नेताओं ने जनता के सिर फोड़ा और सुखद ये कि हालात सुधरे तो खुद की कॉलर खड़ी कर ली, जबकि जनता भूखी रहकर, जैसे-तैसे गुजारा कर रही है और घर में बंद है, तो इसके लिए जनता ही तारीफ की जाना चाहिए, क्योंकि लाख परेशानी उठाने के बावजूद चुपचाप आदेशों का पालन करती जा रही है।

सीएम का काफिला निकला और भीड़ लगी

अब बड़ी बात ये है कि ऐसा क्या हुआ कि अचानक मुख्यमंत्री को 10 दिन की सख्ती करने का आदेश जारी करना पड़ा, तो इसके पीछे का कारण भी आपको बता देते हैं, जब मुख्यमंत्री का काफिला कलेक्टोरेट जा रहा था, तब रास्ते में बैरिकेड्स लगाकर चौराहों पर और सड़कों पर ट्रैफिक रोक दिया था। तो लाजिमी है कि ऐसे में एक ही जगह भीड़ लगेगी (दोष किसका)? इसके बाद जब बैठक खत्म हुई और फिर शिवराजसिंह चौहान का काफिला निकला तो फिर माननीय मुख्यमंत्रीजी को सड़क पर भीड़ दिखाई दी। इसके बाद बिना सोचे-समझे तुगलकी फरमान रात में जारी कर दिया कि आने वाले 10 दिन हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है, इसलिए सख्ती जरूरी है?

इसके पहले के दिन क्या हमारे लिए महत्वपूर्ण नहीं थे? आज लोगों के सामने सबसे बड़ी मुसीबत पेट भरने की है। हर आदमी परेशान हो गया है, पहले तो बीमारी मार रही है, दूसरे प्रशासन के सख्ती के आदेश उसे भूखों मरने को मजबूर कर रहा है। 


दो माह से त्रासदी झेल रही जनता

दो माह से आदमी घर में कैद होकर रह गया है। जनता में प्रदेश सरकार के खिलाफ जबर्दस्त नाराजगी है, क्योंकि जनता का जीना दुश्वार हो गया है। हर रोज ऐसा एक आदेश निकल रहा है, जो लोगों के जीवन-मरन से जुड़ा है, सब्जी नहीं मिलेगी, दूध वाला आधा शटर गिराकर दूध बेचेगा। जिस तरह से मुख्यमंत्री तुगलकी आदेश निकाल रहे हैं, उससे आम जनता की ही मुसीबत बढ़ रही है, जब आदमी काम नहीं करेगा तो उसका घर कैसे चलेगा? इस तरफ तो न अफसरों का ध्यान जा रहा है, न ही जनप्रतिनिधियों का। जनप्रतिनिधि तो मिट्ठू और पिट्ठू बन गए हैं, सरकारी तंत्र के, जैसा अफसरों ने बोला वैसे ही रट्टा लगा रहे हैं। राजतंत्र चला रहे आंख वाले अंधों को ये दिखाई नहीं दे रहा है कि जब अन्य शहरों की दुकानें खुलना शुरू हो रही है तो इंदौर में बाजार बंद करा रहे हैं। डॉक्टर और वैज्ञानिक इम्युनिटी बढ़ाने के लिए लोगों को फल और सब्जियां और ड्रायफ्रुट खाने की सलाह दे रहे हैं और इधर, अधिकारी बाजार बंद करा रहे हैं, काम-धंधे बंद करा रहे हैं। सिर्फ मेडिकल खोलने की छूट दी है, जब आदमी के पास पैसा ही नहीं होगा तो वह कैसे खुद का और परिवार के स्वास्थ्य की रक्षा कर पाएगा। जनता के लिए तो रोजगार ही सबसे बड़ी इम्युनिटी है...,जिस पर तालाबंदी कर दी गई है।

चुनाव में इस बार जनता निपटाएगी

इंदौरी दमखम दिखाने वाले नेता जो जनता के रहनुमा बनते हैं, कोई बाबा, भैया, दादा, दीदी, भाभी और न जाने कितने रिश्ते जोड़ लिए हैं उन्होंने अपने राजनीति चमकाने के लिए, लेकिन सारे रिश्तों को अफसरों की चाकरी में भूल गए। जनता में काफी नाराजगी है और वक्त अब बदलाव का ही होने वाला है, जनता पूरी तरह से मन बना चुकी है कि आने वाले चुनाव में क्या करना है? क्योंकि आपको इसलिए शहर और प्रदेश का जनप्रतिनिधि नियुक्त किया है कि आप जनहित में काम करो, न कि राजतंत्र चलाने के लिए।