विचार बदल गए हैं लोग बदल गए...!




जगजीत सिंह भाटिया

प्रधान संपादक
जवाबदेही समाचार पत्र

23 मार्च शहीदी दिवस, ये दिन कालचक्र की तरह हमेशा हमारे साथ और आने वाली पीढ़ी के साथ चलता रहेगा। तमाम कार्यक्रम होते रहेंगे, क्योंकि इस तारीख को कोई भूला न दे, क्योंकि इस दिन हमारे देश के तीन नौजवान क्रांतिकारियों को अंग्रेजी हुकूमत ने फांसी पर लटका दिया था और पूरा देश गमगीन हो गया था। आजादी के परवानों को ये मंजूर था, लेकिन सिर झुकाना मंजूर नहीं था। 

आज विचार बदल गए हैं, लोग बदल गए हैं...। वर्तमान की स्थिति को देखें तो पता चलता है कि जिन लोगों की उम्र अभी काम करने की है, उनके लिए यह आजादी एक दिन आॅफिस का जल्दी बंद हो जाना और काम नहीं करना पड़ा तो आजादी से बीत जाए समय और शाम। युवाओं को चुनौतियां स्वीकार नहीं है। अब वैसा वक्त नहीं है कि तुम्हें हथियारों के दम पर अपने लिए या देश के लिए कुछ करना पड़े, लेकिन नैतिक जिम्मेदारियों को भी लोग निभा नहीं पा रहे हैं। खासकर सरकारी नौकर जो गैर जिम्मेदार हो चुके हैं। 

वहीं, अगर पेशे की बात करें तो हमारे देश में जितने भी लोग अपना व्यवसाय चला रहे हैं, चाहे उद्यमी हो या बड़े कारोबारी वह राजनेताओं से बचना चाहते हैं या यूं समझ लो मुक्ति चाहते हैं। इसके पीछे कारण यह है कि ये लोग उनके सामन नियमित रूप से कुछ न कुछ समस्याएं (मांग) रखते आते हैं। इसके अलावा यह वर्ग यह भी चाहते है कि सरकारी अफसरों की भ्रष्ट प्रक्रियाओं से उन्हें आजादी मिले। आप यकीन मानिए हमें अंग्रेजों से तो आजादी मिल गई, लेकिन लालफीताशाही और घूसखोरी, जो बरसों से देश का खून चूस रही है, उनसे कभी देश आजाद नहीं हो सका। शहीदों ने इनके लिए कुर्बानी नहीं दी थी, लेकिन ये पीस्सू देश की पीढ़ी को खोखला करते जा रहे हैं। इसके अलावा एक कड़ुवा सच यह भी है कि जिसने सरकारी नौकरी पा ली, समझ लो वह नियमों का पुजारी भी है! वह गलत भी कर रहा है तो जायज है..., और जो व्यक्ति ईमानदारी से अपना काम कर रहा है, तो वह इस नियम के पुजारी के सामने बेईमानी है..., जो इसे पसंद नहीं है। 23 मार्च को पूरा देश शहीदी दिवस मनाएगा। संकल्प लिए जाएंगे कि हमें भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू के सपनों का भारत बनाना है, लेकिन यह संकल्प मात्र उस एक घंटे के आयोजन तक सीमित रहती है, उसके बाद 364 दिन तो वही करना है जो मन करे। आज  बच्चों को इतिहास पढ़ाने की जरूरत है। हमारे देश के लिए सच्चे आदर्श वाले महापुरुषों की गाथा सुनाने-पढ़ाने की जरूरत है, लेकिन ( ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार) पढ़ाने के चक्कर में हम भारतीयों ने बच्चों को भारतीयता से दूर कर दिया है। हम मानते हैं कि आज के दौर में  अंग्रेजी मायने रखती है, लेकिन उस बच्चे को पहले हिंदी के क, ख, ग, घ तो पढ़ाओ, उसके बाद विदेशी भाषा ए, बी, सी, डी से परिचय कराओ, क्योंकि मातृभाषा से बच्चों को दूर करना भी गलत है। जब तक बच्चा देश के बारे में नहीं जानेगा, तब तक वह यह कैसे जान पाएगा कि शहीदी क्या होती है और आजादी क्या होती है...?