हर अच्छी बात समझानी क्यों पड़ती है...!

 


जगजीत सिंह भाटिया
प्रधान संपादक
जवाबदेही समाचार पत्र

एक तस्वीर देखी रीगल तिराहे पर कि लोग वाहन चालकों को नियमों का हवाला देकर वाहन ठीक से चलाने का निवेदन कर रहे हैं। वहीं पोस्टर-बैनर हाथों में लेकर समझाइश दे रहे हैं कि यातायात के नियमों का पालन करें। हर साल की तरह इस साल भी अभियान चलाया जा रहा है, ताकि  जनता समझे, लेकिन जनता समझने को तैयार नहीं। वहीं, एक सवाल हमेशा कचोटता है कि हर अच्छी बात लोगों को समझाना क्यों पड़ती है। बुरी आदतों को आदमी खुद ही आत्मसात कर लेता है, लेकिन अच्छी आदतें अगर उसके जीवन में लाना है तो दुनियाभर के खटकरम करना पड़ते हैं, शिविर लगाना पड़ते हैं, प्रचार-प्रसार करना पड़ता है। हमेशा वाहन चालकों को समझाइश क्यों देना पड़ती है? क्यों उन्हें बार-बार यह कहा जाता है कि रेड सिग्नल ना तोड़े, दो पहिया वाहन चलाते समय हेलमेट पहने, कार चलाते समय बेल्ट लगाए जैसी कई बातों को रटाना पड़ रहा है, लेकिन वाहन चालक है कि समझने को तैयार नहीं हो रहे हैं। ट्रैफिक पुलिस भी जैसे-तैसे अभियान समाप्ति की राह देख रही हैं। बच्चे स्कूल में तो पढ़ाई कर नहीं पा रहे हैं, चौराहों पर खड़े होकर लोगों को समझा रहे हैं। सीधी-सी बात है कि कोई भी वाहन चालक हो उसे नियमानुसार वाहन चलाना चाहिए। वहीं, सामाजिक स्तर पर सभी को ये भी समझाना पड़ता है कि बड़ों का आदर किया करो? लेकिन कोई आदर कर ही नहीं रहा, कचरा समझकर रख दिया है बुजुर्गों को। वो तो भला हो उस आदमी का जिसने बुजुर्गों के साथ हो रही अमानवीयता को अपने मोबाइल में कैद करके पूरे देश को जगा दिया कि बुजुर्गों की इज्जत करो...। वहीं यह बात समझ से परे है कि बुजुर्गों के सम्मान की बात भी समझाने की थी। भगवान तो हर गलती की माफी दे देते हैं, लेकिन क्या मन शांत रहेगा।