जगजीत सिंह भाटिया
प्रधान संपादक
जवाबदेही समाचार पत्र

इंदौर के चिंतकों को टाइम लाइन से मतलब है, काम कैसा हो रहा है, कौन कर रहा है, निर्माण होने के बाद क्या-क्या खामियां आएगी, उसके बारे में कोई विचार नहीं किया जाकर जनता के करोड़ों रुपयों को फूंक दिया जाता है। जब निर्माण हो जाता है तो वाहवाही के तमगे भी लेने में कोई पीछे नहीं रहता, क्योंकि काम टाइम लाइन से जो हो जाता है, लेकिन हकीकत की पोल तब खुलती है, जब खामियां सिर चढ़कर बोलती है, कुछ ऐसा ही मामला इन दिनों इंदौर में चल रहा है। ट्रैफिक का रोना तो शहर की किस्मत में शुरू ही लिखा हुआ है,जब सड़कें संकरी थी, तब भी और आज चौड़ी हो गई हैं, तब भी। अब विकास कार्यो में कहां क्या कमी रह गई है, उस पर मंथन शुरू हो गया है। 56 दुकान शहर की शान है और देशभर में इसकी पहचान है, जब इस क्षेत्र को संवारा जा रहा था, तब जवाबदेही ने अफसरों को चेताया था कि जब भी यह क्षेत्र बन जाएगा, तब पार्किंग की परेशानी आएगी, क्योंकि शास्त्री ब्रिज से आने वाले वाहन चालकों को कहां जगह मिलेगी गाड़ियां रखने की। जब जंजीरवाला चौराहे से या ओल्ड पलासिया से लोग इस क्षेत्र में जाएंगे तो उनके लिए वाहन खड़े करने की व्यवस्था कहां होगी? इस विषय पर विस्तार से बताया गया था कि यह प्रोजेक्ट तब ही ससक्सेस होगा, जब यहां अंडरग्राउंड पार्किंग होगी, लेकिन अफसरगीरी इतनी हावी हो चली है कि पूरे शहर में मनमर्जी करने में लगे हैं। 

ऐसा ही मामला शहर के चौराहों की रोटरी को लेकर है। सौंदर्यीकरण के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च कर कभी बड़ी रोटरी तो कभी छोटी रोटरी बनाई जाती है, लेकिन कभी स्थायी हल के लिए प्रयास नहीं किया जाता। बीआरटीएस जब निर्माण हो रहा था, तब भी आगाह किया गया था कि बीआरटीएस लेन में छोटे-छोटे अंडरपास होने चाहिए, जिससे क्षेत्रीय लोग आ-जा सके, लेकिन ऐसा नहीं किया गया, आज हालात सभी के सामने हैं, जो सर्विस लेन बनाई गई हैं, उस पर दुकानदारी शुरू हो गई है। यह हमारे शहर का दुर्भाग्य है कि विकास के साथ-साथ इसे मुसीबतों का सामना ज्यादा करना पड़ता है। 

सड़कों की डिजाइन को लेकर भी कई बार सवाल खड़े हुए, लेकिन हल निकाला कभी नहीं जाता। इंदौर में करीब 30 खतरनाक चौराहे चिह्नित किए गए हैं, जहां कई लोग जान से हाथ धो बैठे हैं, लेकिन चिंतन सिर्फ उस दिन होता है, जब किसी की जान जाती है, उसके बाद मामला आया-गया हो जाता है।  इंदौर की तुलना तो स्मार्ट शहरों से की जाने लगी है, लेकिन धरातल पर असुविधा जनता को कितनी भुगतनी पड़ रही है, ये सिर्फ जनता ही जान रही है...।