क्या माता-पिता निभाएंगे अपना होने की जवाबदेही

 


जगजीत सिंह भाटिया
प्रधान संपादक
जवाबदेही समाचार पत्र


2020 बीतने में कुछ ही दिन शेष हैं और 2021 आने को आतुर है। बीत रहा साल हर किसी के लिए कहीं न कहीं मुसीबत ही लेकर आया। कोरोना काल मार्च महीने से शुरू हो गया था...लेकिन इसका खत्म नहीं हुआ है। लॉकडाउन ने लोगों को जीना सीखा दिया था, लोग घरों में परिजनों के साथ रहे और लॉकडाउन से एक-दूसरे के प्रति संवेदनाएं भी जागी, चाहे रिश्तों में हो या पड़ोसियों को लेकर क्यों न हो।...लेकिन मानवीय स्वभाव जिसे भूलने की आदत है...और वह इस कोरोनाकाल के दौरान जितनी भी अच्छाइयां खुद में अर्जित कर चुका था, एक क्षण में भूल गया। महामारी तो अपना काम कर ही रही है.., लेकिन लोग अपनी सारी हदें पार कर रहे हैं।  कुछ दिनों से इंदौर की छवि कोे खराब करने वाली कई खबरें सामने आ रही है, खासकर युवाओं के बिगड़ने की। उन्होंने अपना जीवन खराब करने का ही सोच लिया है, खासकर लड़कियां जिन्हें मर्यादाओं में रहना चाहिए, लेकिन उन्होंने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली बात का शायद मायना गलत निकाल लिया है। जो बिगड़ैल प्रवृत्ति के युवा हैं, उनके साथ वह भी बिगड़ती जा रही हैं। माता-पिता की जवाबदेही बनती हैं कि वो अपने बच्चों से सवाल करें? लेकिन बच्चा कुछ कर लेगा, इस चिंता में वो उन्हें सही राह नहीं दिखा पा रहे हैं और बच्चे नशे की दुनिया में जीवन बर्बाद कर रहे हैं। हर बार की तरह इस बार भी कुछ लोग संकल्प लेंगे कि 2021 में हम इन बुराइयों को त्याग देंगे, लेकिन बुराई कभी खत्म होते दिखाई नहीं पड़ती। 

सोशल मीडिया पर लड़कियां पैग बनाते हुए अपना वीडियो शेयर कर रही हैं तो कुछ लड़कियां सिगरेट के छल्ले उड़ाते हुए लाइफ स्टाइल का गुणगान कर वीडियो शेयर कर रही हैं। हर मेट्रो शहर के ये हाल हो चुके हैं। संस्कृति को तो युवा मान ही नहीं रहे हैं। अच्छाई की शुरुआत घर से होती है। जब तक माता-पिता अपनी जवाबदेही नहीं समझेंगे और बच्चों को सही मार्गदर्शन नहीं देंगे, तब तक युवा पीढ़ी सुधरने वाली नहीं है। हालात किसी से छुपे नहीं है। शहर में रहकर पढ़ाई करने वाली युवा पीढ़ी आजादी की जिंदगी जीने लगी हैं। लिव-इन के मामले भी काफी बढ़ चुके हैं और समाज के लिए नासूर बन गए हैं। लोग कानून व्यवस्था बनाए रखने वालों की तरफ आस लगाए बैठे रहते हैं कि वो कुछ करेंगे, लेकिन हकीकत उससे परे हैं। माता-पिता बच्चों को पढ़ाई करने शहरों में भेज रहे हैं, लेकिन उनके होनहार गलत आदतों का शिकार हो चुके हैं। जब बच्चे बड़े होने लगते हैं तो माता-पिता को उनके साथ दोस्तों जैसा व्यवहार करना चाहिए। बच्चे क्या बनना चाहते हैं, वो हमसे क्या उम्मीद रखते हैं। माता-पिता को अपने निर्णय उन पर नहीं थोपना चाहिए। वहीं, होस्टल में बच्चे रह रहे हैं तो कुछ समय उनके साथ बिताए। गलती हर इनसान से होती है। बड़ों का दायित्व रहता है कि वो बच्चों को सही मार्गदर्शन दें...। नहीं तो बच्चे अवसादग्रस्त होकर गलत कदम उठा लेते हैं.....।