गुंडों का माई-बाप कौन?

 


जगजीत सिंह भाटिया
प्रधान संपादक
जवाबदेही समाचार पत्र

 
गुंडे कौन पालते हैं...? इनके माई-बाप कौन होते हैं...? ये बातें जनता भलीभांति जानने लगी है। इस सूची में नेताओं के नाम पहले पायदान पर है तो दूसरे नंबर पर पुलिस भी है। सौदागरों की दुनियां में जनता बेबस होती जा रही है। जनता तो यह तक कहने लगी है कि सरकार किसी की भी हो, भ्रष्टाचार कभी न खत्म होने वाला दानव बन गया है, क्योंकि नेताओं को अपनी राजनीति चमकानी होती है और इसके लिए वह अफसरों से भी सांठगांठ करके ही चलते हैं। नेताओं को अपना रसूख दिखाना होता है तो वो गुंडे पालते हैं और पुलिसवाले को पता रहता है कि इस गुंडे का माई-बाप यह नेता है। गुंडों को लेकर यह बात हो रही है कि अब इनके जुलूस नहीं निकाले जाएंगे और न ही इनकी फोटो अखबारों में प्रकाशित की जाएगी। कानून के जानकार कहते हैं कि जो आदतन अपराधी है, उनका जुलूस निकालने में कोई कोताही नहीं बरतनी चाहिए, क्योंकि ये समाज के दुश्मन होते हैं। अगर ऐसे बदमाशों के बारे में लोग नहीं जान सकेंगे तो अनजाने में इन बदमाशों के साथ किसी की भी बहन-बेटी की शादीहो जाती है तो उस लड़की को तो  जिंदगीभर पछताना पड़ता है और उसके परिवार के साथ भी समाज में अपराधियों जैसा व्यवहार किया जाता है। वैसे पहले जो निर्णय लिए जाते थे, वह विवेक के आधार पर लिए जाते थे, अब निर्णय नेता या अफसरों के कहने पर होते हैं, जो नोट देगा उसी के पक्ष में निर्णय दिया जाएगा।  न्यायपालिका पर से लोगों का भरोसा भी उठता जा रहा है।  भ्रष्टाचारियों ने सारी मर्यादाओं को बेशर्मी की खूंटी पर टांग कर रख दिया है। अफसर हो या बाबू रिश्वत के मामले में भिखारी से ज्यादा बदतर हो गए हैं। कानून की रक्षा करने वाले झोली फैला रहे हैं। शिक्षा के मंदिर में बैठकर देश को गढ़ने वाले भी शिक्षा को बेच रहे हैं। लोगों की जिंदगी देने वाले डॉक्टरों ने शायद पढ़ाई भी इसीलिए की है कि वो जीवन देने के लिए सौदा कर सके।  अब कोरोना काल में कुछ ऐसी बातें भी सामने आई, जिस पर पुलिस महकमे को तो शर्म नहीं आई, लोगों ने जरूर उन्हें कोसते हुए चाय-पानी के लिए कुछ रुपए दे दिए। कोराना की गाइड-लाइन के चलते शादी-ब्याह के लिए संबंधित थाने से परमिशन लेना अनिवार्य की गई थी। लोग थाने पहुंचे तो आवेदन देने के दौरान थाने में बैठे जवान खर्चा-पानी मांगने लगे..., 100 से लेकर 500 रुपए तक लोगों को देना पड़े। बड़ी बेशर्मी से भी बोले जा रहे थे... आपके घर में खुशी का माहौल है तो क्या नेग भी नहीं दोगे। इतने बेशर्म हो चुकी है पुलिस। बेचारे क्या करते थाने की सील लगाने के लिए और कानूनी उलझनों से बचने के लिए लोगों को मन मारकर रुपए देना पड़े...।