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हाथरस : पीड़ितों से कोई लेना-देना नहीं


जगजीत सिंह भाटिया
प्रधान संपादक
जवाबदेही समाचार पत्र


उत्तरप्रदेश के हाथरस की घटना को जिस तरह राजनीतिक रंग दिया जा रहा है, उससे समझा जा सकता है कि देश के कर्णधार क्या चाहते हैं, अपनी चमक बरकरार रखने के लिए पीड़ितों के रहनुमा बन जाते हैं। पीड़ित का दर्द तो एक बहाना है, लेकिन असल खेल एक-दूसरे को नीचा दिखाने को लेकर ही किया जा रहा है। हर कोई सिर्फ एक ही सवाल कर रहा है कि आखिर हो क्या रहा है हाथरस में..., 


हमारे देश का दुर्भाग्य है कि यहां पीड़ितों को जल्दी न्याय नहीं मिलता और अपराधियों को सजा। कानून की लचर व्यवस्था अपराधियों को बचाए रखती है और पीड़ितों को ये नेता चैन से जीने नहीं देते। पुलिस के रवैये पर सवाल उठना कोई नई बात नहीं है, पुलिस ऊपरी दबाव में आकर हर नियम को परे रख काम करती आई है और करती रहेगी। जांच और जांच के नाम पर 5-10-15 साल निकालने में माहिर है नेता, अफसर और वकील....पूरे देश में इस तरह के हालात है, मीडिया किसी मामले को तूल देकर बड़ा कर देता है तो घटना बड़ी हो जाती है, नहीं तो कई बेटियों को गुंडे सरेराह छेड़ रहे हैं और अस्मत लूट रहे हैं, लेकिन बदमाशों पर सख्ती नहीं की जाती।नेता घर बैठे-बैठे सूर्खियां बटोरने के लिए ट्वीटर का सहारा ले रहे हैं, जो मन में आया मैसेज सेंड कर दिया..., विरोध किया गया तो माफी मांग ली। बस इसी तर्ज पर काम हो रहा है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वाले अपनी टीपी बढ़ाने के लिए जो मन में आया सवाल पूछ रहे हैं (खाना खाया, नहीं खाया,,, चटनी-रोटी खाई, आज दरवाजा नहीं खोला)... सहित ऐसे कई सवाल उठाते रहते हैं, जिससे  पीड़ित के न्याय को लेकर कोई वास्ता नहीं रहता।  कुछ सालों पहले पिपली लाइव फिल्म आई थी, जिसमें एक व्यक्ति (नत्था) द्वारा  आत्महत्या करने वाला है कि बात पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का तमाशा दिखाया गया था।