गुंडे के अंत पर सवाल उठाना गलत



विकास दुबे का एनकाउंटर होना जरूरी था
कानपुर में 8 पुलिसकर्मियों की हत्या के आरोपी को घटना के आठवें दिन ही कर दिया ढेर


जवाबदेही.इंदौर
कानपुर में आठ पुलिसकर्मियों की हत्या करने वाले 5 लाख के इनामी गैंगस्टर का मध्यप्रदेश के महाकाल से पकड़ा जाना और कानपुर के पहले उसका एनकाउंटर होना एक सच है। इस दुर्दांत गैंगस्टर के पकड़े जाने और एनकाउंटर पर पुलिस पर सवाल उठाना गलत है? क्योंकि विकास दुबे कोई सम्मानजनक व्यक्ति नहीं था, जिसके लिए इतने सवाल उठाए जा रहे हैं। जब उसने आठ पुलिकर्मियों को मारा तब, उसके खिलाफ आग उगलते हुए देखा गया, अब जब वह मारा गया तो पुलिस पर सवाल उठाते देख रहे हैं। 


साफ-सुथरे समाज के लिए गुंडों का अंत होना बहुत जरूरी हो गया है। इसके लिए अब पुलिस को भी अपनी ईमानदारी का परिचय देना होगा और जिस तरह खाकी की इज्जत की खातिर इस विकास दुबे को ढेर किया, ठीक इसी तरह अब किसी गुंडे को पुलिस की पनाह नहीं मिलनी चाहिए, नहीं तो फिर एक और विकास दुबे जैसा गुंडा सिर उठाकर साफ-सुथरे समाज को गंदा करता रहेगा। मीडिया (जवाबदेही नहीं) को ऐसे गुंडों के एनकाउंटर पर चुप रहना चाहिए, क्योंकि पुलिस ने एक सामाजिक बुराई को खत्म किया है, न कि अच्छाई को। 



गुंडों से कौन नहीं दुखी है, हर जगह इनका आतंक है। सवाल सिर्फ पुलिसवालों पर नहीं, बल्कि नेताओं पर उठाना चाहिए, क्योंकि इन्होंने भी अपनी दबंगई कायम रखने के लिए गुंडों का सहारा लिया है। ये अकेले उत्तर प्रदेश की बात नहीं है, सभी राज्यों की बात है। हर जगह ये गुंडे समाज को खोखला करते जा रहे हैं। गुंडों की हुकूमत कायम रखने के लिए पुलिस भी सहारा देती है। गुंडे खेत, मकान, दुकान, जमीन आदि पर कब्जा करते हैं और लोगों को अपनी मेहनत की कमाई गंवाना पड़ती है। 
अगर उत्तर प्रदेश की पुलिस और नेताओं का सहारा अगर विकास दुबे को नहीं मिलता तो क्या मजाल थी, उसकी कि वो अपराध का इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लेता।