बोलने की आजादी का दुरुपयोग कब तक 

 




- ललित भारद्वाज


विगत 5-6 वर्षों से हिंदुस्तान में बोलने की आजादी का दुरुपयोग बहुत ज्यादा ही होने लग गया है। अब तो इस आजादी का यह हाल हो गया है कि चलता फिरता साधारण सा व्यक्ति भी कभी भी कुछ भी बोलने में संकोची भाषा के इस्तेमाल को भी भूल गया है। नए नए बने छुटभैये नेता, छात्र नेता, यूनियन लीडर  व औकातहीन राजनेता बोलते वक्त मर्यादा शब्द की परिभाषा भी भूल गए हैं। आजतक हिंदुस्तान में कई प्रधानमंत्री आए लेकिन उनके बारे में अभद्र भाषा का उपयोग इतना कभी भी नहीं हुआ जितना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर हो रहा है। वैसे तो अतीत में प्रधानमंत्री पद के प्रति अभद्र भाषा का उपयोग हुआ ही नहीं। ऐसे में लेखक तो इतना ही कहेगा कि क्या वास्तव में नरेंद्र मोदी इतना नकारा प्रधानमंत्री हैं जो किसी को भी रास नहीं आ रहा। नहीं ऐसा नहीं है। 


दरअसल में हकीकत तो यह है कि पहले चोर-चोर मौसेरे भाई थे। मिल बांट कर देश को खाते जा रहे थे। इसलिए किसी को भी प्रधानमंत्री जैसे गरिमामय पद के बारे में बोलना ही नहीं पड़ता था। लेकिन नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आते ही व प्रधानमंत्री बनते ही इस बात की घोषणा कर दी कि न तो मैं खाऊंगा और न किसी को खाने दूंगा। अब ऐसे में सभी नेताओं की हालत पतली होने लगी। जब हालत पतली हुई तो उन्होंने नवयुवकों, छात्र नेताओं, अल्पसंख्यकों, अशिक्षितों व विशेष रूप से मुसलमानों में इस व्यक्ति विशेष के बारे में इतनी ज्यादा नफरत की आग भर दी कि एैरा-गैरा चलता फिरता व्यक्ति जिसकी औकात टके की भी नहीं थी उसने प्रधानमंत्री जैसे गरिमामय पद पर बैठे नरेंद्र मोदी को चोर-उचक्का, डकैत, पागल, बंदर, राक्षस व रावण जैसे अनेकों गिरे से गिरे शब्दों के साथ अलंकृत कर दिया। उधर प्रधानमंत्री मोदी जी खूब गालियां व अपशब्द सुनते रहे लेकिन जो भी देश हित का कार्य जरूरी था वह निरंतर करते रहे। लेकिन यहां पर लेखक केंद्र में बैठी केंद्रीय सरकार से इस बात को पूछने के लिए लालायित है कि आज तक संसद में ऐसा बिल क्यों नहीं लाया गया जिसमें प्रधानमंत्री जैसे गरिमामय पद के बारे में बकवास करने वालों के लिए कठोर दंड का प्रावधान हो। छात्र नेता बोलने की आजादी के अंतर्गत हिंदुस्तान के हजार टुकड़े करने की बात करते हैं, उन पर राष्ट्रद्रोह जैसे मुकदमें चलने में सरकार हिचकिचाहट क्यों दिखा रही है। चंद मुस्लिम नेता, मुल्ला व मौलवी भारतवर्ष के बारे में खुली बकवास करते हैं। उन पर कोई शिकंजा कसा नहीं जाता। 


अब समय आ गया है कि केंद्र में बैठी सरकार ऐसे ठोस कानून जल्द से जल्द बनाए जिसमें बोलने की आजादी में सीमितता का समावेश हो। अगर देश के प्रत्येक नागरिक को बोलने का अधिकार मिला है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह बोलते वक्त अपनी औकात ही भूल जाए। ममता बनर्जी, औबेसी बंधु, राहुल गांधी व अन्य मूल्यहीन राजनेता अपनी बोलने की औकात से बाज नहीं आ रहे है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश की जनता ने स्पष्ट जनादेश के साथ चुना है। ऐसे में इन जैसे नेताओं को अपनी औकात में रहकर ही शब्दों का उपयोग करना चाहिए। अंत में लेखक केंद्र सरकार को बार-बार इस बात को लेकर आगाह कर रहा है कि हिंदुस्तान में कैंची की तरह जुबान चलाने वालों के लिए अति शीघ्र ठोस कानून बनाया जाए ताकि भविष्य में बोलने की आजादी का दुरुपयोग न हो हो सके।