नवजात की हत्या...! रूह कांप जाती है...


जगजीतसिंह भाटिया
प्रधान संपादक


फरवरी में दो मामले सामने आए, जिसमें नवजात को जानलेवा हमला किया गया। पहला मामला मध्यप्रदेश के शाजापुर जिले का है। शाजापुर जिले के मोहन बड़ोदिया की मंजू सिंह ने बेटी को जन्म दिया। उसकी एक बेटी पहले से थी और वह बेटा होने की चाहत रखती थी। बेटा न होने पर मंजू ने जन्म के दूसरे दिन नवजात बच्ची की गंडासे से काटकर हत्या कर दी। महिला को जेल भेज दिया है। वहीं, दूसरा मामला गुजरात के राजकोट के ठेबचड़ा गांव के पास का है। बुधवार 11 बजे करीब 20 लड़के क्रिकेट खेलकर जा रहे थे, तभी उन्हें बच्ची के रोने की आवाज सुनाई दी। उन्होंने नजरें दौड़ाई तो एक कुत्ता बच्ची को मुंह में लेकर जा रहा था। लड़कों ने बिना देर किए तुरंत पत्थर मारे तो कुत्ता बच्ची को छोड़कर भाग गया। बच्ची अस्पताल में भर्ती है। जांच में स्पष्ट हुआ कि उसकी मां ने जन्म के दूसरे दिन में ही बच्ची को छोड़ दिया। बच्ची के पेट में 15 से 20 गहरे घाव हो गए। कहा जाता है कि ईश्वर हर जगह नहीं पहुंच सकता इसलिए मां को बनाया गया है, लेकिन राजकोट में एक दिन की बच्ची के साथ हुई घटना समाज की चेतना का दिल दहला सकती है। किस हालात में मां ने इस बच्ची को छोड़ा होगा।


लड़की का जन्म होना, क्या उसका दोष है? भले पढ़े-लिखे लोग हो या न हो, लेकिन क्या उन्हें इतना भी नहीं पता कि लड़की का जन्म सृष्टि से जुड़ा होता है।  वह भविष्य में एक जन्मदात्री भी बनेगी और जिसने उसे जन्म दिया वह भी एक जननी ही है तो फिर ऐसी क्या लाचारी आ जाती है, जिसके फलस्वरूप मासूमों की हत्या कर दी जा रही है। बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओं नारे का असर शायद लोगों के दिलों-दिमाग में नहीं गया। जो लोग निसंतान रहते हैं, वो मंदिरों की सीढ़ियों पर नाक रगड़ते नजर आते हैं और ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उनके आंगन में बच्चे की किलकारियां गूंजे, दूसरी तरफ जिनकी गोद ईश्वर भरता है, वो बच्चों की हत्या तक कर रहे हैं। इन्हीं मासूमों को नवरात्र में देवी का दर्जा देकर इनके पैर धोकर भोजन कराया जाता हैं, इन्हें पूजा जाता है और इन्हें संस्कार देने की बजाए इनका शोषण तक किया जाता है, ये कैसा समाज है। समाज की अपनी जिम्मेदारी है कि वो बच्चियों के साथ कोई अन्याय न होने दे। देखने में आता है कि अपराधी तत्व बच्चियों के साथ गंदी हरकत करते पकड़ा जाता है और लोग उसे कानून सजा देगा, कहकर मारपीट कर पुलिस के हवाले कर देते हैं। कानून अपना काम करता है, लेकिन हकीकत में लोगों को ही न्याय करना होगा। असामाजिक तत्व वर्तमान के राक्षस है। द्वापर युग में भी जो राक्षस लोग थे वो अपराधी प्रवृत्ति के ही थे। उनके सिर पर कोई सिंग नहीं थे। वो अराजकता फैलाते थे, ठीक आज के अपराधियों की तरह। इसलिए ऐसे लोगों को बख्शा नहीं जाना चाहिए।