मैं अपने भारत में खुद को सुरक्षित महसूस क्यों नहीं कर सकती....! इस शब्द में देश का दर्द

नेताओं को बोल वचनों के बीच आम आदमी उलझकर रह गया है। नेता बोलना भी नहीं चाहे तो उसके मुंह में माइक घुसेड़कर कुछ न कुछ बुलवा ही लिया जाता है, जिससे उस न्यूज चैनल को मसाला मिल जाता है और जनता के बीच मनमुटाव होने लगते हैं। ऐसा नहीं कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ही इसके लिए दोषी, प्रिंट मीडिया भी उतना ही दोषी होता जा रहा है। जानकर आग में घी डालने का काम किया जा रहा है। मुद्दों से भटककर मीडिया काम कर रहा है। 


देश में युवा वर्ग नशे की गर्त में समाता जा रहा है। बची कसर स्मार्ट फोन ने पूरी कर दी है। दिनभर मोबाइल में व्यस्त रहने के कारण युवा शक्ति कमजोर होती जा रही है। क्योंकि कोई काम ही नहीं करना चाहता। मीडिया की प्रमुख जिम्मेदारी होती है कि समाज में व्याप्त बुराइयों को प्रकाशित कर समाज को एक नई दिशा दे, लेकिन मीडिया घटनाक्रम को प्रकाशित कर रहा है। समाज सुधारने की दिशा में कहीं कोई उल्लेख नहीं होता। सारी जिम्मेदारी समाज की है, चाहे फिर वह कोई भी समाज हो। राजनेता कुर्सी के लिए किसी को आतंकी कह रहे है तो कोई गड़े मुर्दे उखाड़ रहा है। सत्यता को कोई स्वीकार नहीं कर रहा है।
नेताओं ने निजी हित के कारण देश का बंटवारा कर दिया, क्या इस सत्यता को कोई नहीं जानता, लेकिन स्वीकारना कोई नहीं चाहता। लालफीताशाही ने देश में लूटमार मचा रही हैं, क्या कोई नहीं जानता, लेकिन इस सत्य को जानते हुए भी इन भ्रष्टाचारियों का साथ दिया जा रहा है। ये दानव कोई आज के नहीं है, बरसों से देश के सीने में शूल से चूभ रहे हैं, लेकिन इनसे छुटकारा दिलाने की कोशिश कोई करता नजर नहीं आता। इंटरनेट हमारे देश में दुविधा देने वाला हो गया है, क्योंकि पोर्न साइट्स को देख युवा अपराध करने लगे हैं। देश में दुष्कर्म की घटनाओं का ग्राफ तेजी से बढ़ता जा रहा है।


गुरुवार को तेलंगाना के रंगारेड्डी जिलो में गुरुवार को एक महिला डॉक्टर से सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या कर दी गई। फिर पूरे देश में प्रदर्शन होने लगेंगे। मामले को लेकर शनिवार को दिल्ली में संसद के बाहर युवती अनु दुबे अकेले प्रदर्शन करने पहुंची। अनु ने पोस्टर में लिखा था- (मैं अपने भारत में सुरक्षित महसूस क्यों नहीं कर सकती)। इस एक लाइन में पूरे देश का दर्द है, लेकिन इसे खासकर पुलिस समझने के लिए तैयार नहीं है, क्योंकि गुंडे-बदमाश पुलिस के गलियारों से ही निकलकर आते-जाते हैं। जब कभी अपराध होता है तो पुलिस बदमाशों की ही पैरोकारी करते नजर आती है। ये दुर्भाग्य है हमारे देश का कि जब तक कोई बड़ा मामला न हो जाए, तब तक पुलिस लापरवाही बरतती रहती है। लड़कियों और बच्चियों के अपहरण के मामले तेजी से बढ़ते जा रहा हैं। माता-पिता चिंतित रहते हैं कि कहीं उनकी लाड़ली से अनहोनी न हो जाए, लेकिन पुलिस अपना कर्त्तव्य भूलती जा रही है। हमेशा से एक मांग उठ रही है कि दुष्कर्मी को लेकर कोर्ट में मामला लंबे समय तक चलता है, अंत में या तो वह बरी हो जाता है या फिर उसे अन्य राज्य में भेज दिया जाता है, ताकि वह अपना आचरण सुधारे, लेकिन उस पीड़िता और उसके परिजन के दर्द की न कोर्ट को चिंता रहती है न ही पुलिस को। हर बार दुष्कर्म के बाद मांग उठती आ रही है कि दुष्कर्मियों को नपुंसक बना दिया जाए तो फिर क्यों नहीं इस ओर कदम बढ़ाए जाते।


दुष्कर्मी को नपुंसक बनाने की सजा दे जाए तो देश में बड़ा बदलाव आएगा और दुष्कर्म की घटनाएं पूरी तरह खत्म हो जाएगी। यहां यह बात उल्लेखनीय है कि कुछ साल पहले मद्रास हाई कोर्ट ने बच्चों से बलात्कार के मामले में सख्त टिप्पणी की थी कि बलात्कार करने वाले दोषियों को नपुंसक बना देना चाहिए।  'अदालत का मानना है कि बच्चों के बलात्कारियों को बधिया करने से जादुई नतीजे देखने को मिलेंगे।' कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बच्चों के साथ इस तरह की हरकतें देश में सजा के क्रूरतम मॉडल को आकर्षित करती हैं। कोर्ट ने तल्ख शब्दों में कहा कि भारत के विभिन्न हिस्सों में बच्चों से सामूहिक बलात्कार की विभत्स घटनाओं को लेकर अदालत बेखर और मूकदर्शक बनी नहीं रह सकती है। जस्टिस एन किरुबकरण ने अपने आदेश में कहा, 'बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम (पोक्सो) जैसे कड़े कानून होने के बावजूद बच्चों के खिलाफ अपराध बदस्तूर बढ़ रह हैं।' उन्होंने कहा कि इस बुराई में निपटने में ये कानून बेअसर और नाकाबिल साबित हो रहे हैं। रूस, पोलैंड और अमेरिका के नौ राज्यों में ऐसे अपराधियों को बधिया करने का प्रावधान है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बधिया करने का सुझाव बर्बर लग सकता है, लेकिन इस प्रकार के क्रूर अपराध ऐसी ही बर्बर सजाओं के लिए माहौल तैयार करते हैं।