देश की आर्थिक स्थिति के गंभीर हालातों को लेकर कुछ महत्वपूर्ण सुझाव अमल में लाना जरूरी


 


जिस तरह से देश में मंदी का माहौल है, उसे लेकर जवाबदेही ने सामाजिक सरोकार के तहत केंद्र सरकार को कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। इस बार प्रमुख मुद्दा सस्ते दरों पर मिल रहे नेट से देश की होती बर्बादी का है। नेट सस्ता होने का असर पूरे समाज पर पड़ रहा है। आधुनिक जीवन शैली के कारण समाज का हर नौजवान आलसी हो चुका है। दिनभर मोबाइल पर चिपके रहने के कारण काम करने की लालसा युवाओं में खत्म होती जा रही है


1. सरकार द्वारा गरीबों को एक रुपए किलो गेहूं और 2 रुपए किलो चावल उपलब्ध कराने वाली जो योजना है वो बहुत ही गलत है। इस कारण कई लोगों ने काम करना ही बंद कर दिया है एवं सरकार से प्राप्त सस्ता राशन बाजार में बेचकर अन्य वस्तुएं ले आते हैं और बहुत बड़ा हिस्सा नशा करने में खर्च कर देते हैं इसके कारण बेरोजगारी बढ़ रही है एवं उद्योगों को अच्छे मजदूर नहीं मिल रहे हैं और मजदूरी भी बढ़ रही है। इस योजना को यदि बंद नहीं किया जा सके तो कम से कम इसकी कीमत में बढ़ोतरी की जाना आवश्यक है। इसकी बजाए यदि इन्हें मुफ्ता में स्वास्थ्य एवं पढ़ाई जो कि मूलभूत सुविधाएं हैं दी जाए तो ज्यादा बेहतर होगा। वहीं, नौजवानों में बढ़ रही लापरवाही एवं समाज में बढ़ रहे दुष्कर्म की बहुत बड़ी वजह बहुत ही सस्ती दरों पर नेट सेवाओं का उपलब्ध होना है, जिसके कारण अपराधों में बढ़ोत्तरी तो हो रही है साथ ही साथ संचार कंपनियां भी बर्बाद हो रही है। नेट के सस्ते होने का नुकसान देश भुगत रहा है। बच्चे मां के हाथों का खाना नहीं खाते, जब तक मोबाइल हाथ में न हो, स्कूली बच्चे से लेकर कॉलेज तक के छात्र दिनभर मोबाइल पर व्यस्त रहते हैं। पढ़ाई में कमजोर रह रहे हैं। काम करने वाले लोग (चाहे वो मजदूर हो या अफसर या कोई अन्य) काम करने के दौरान मोबाइल का इस्तेमाल कर रहे हैं, इससे कोई भी काम गुणवत्तापूर्वक नहीं हो पाता। महिलाएं दिनभर घरों में मोबाइल में व्यस्त रहती है। इनके साथ-साथ बड़े क्या और बुजुर्ग क्या, सभी मोबाइल में व्यस्त रहते हैं। इससे परिवारों में सब अलग-अलग रहने जैसे हो गए हैं। कुल मिलाकर नेट के सस्ते होने से लोगों का सोश्यल मीडिया पर व्यस्त होना देश की प्रगति में भी बाधक है और एक कमजोर नस्ल हमारे देश में पनप गई है। वहीं अपराधी प्रवृत्ति वाले लोग नेट सस्ता होने से पोर्न साइट्स को देखते हैं, इस कारण दुष्कर्म की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही है। इसलिए अब सख्त नियमों की दरकार है। वहीं, बात करने वाला डाटा सस्ते में उपलब्ध होना चाहिए और नेट के दामों में ज्यादा से ज्यादा बढ़ोतरी करना चाहिए ताकि हर व्यक्ति नेट का इस्तेमाल न कर सके।  ज्ञात हो कि पहले नेट काफी महंगा था और हर कोई नेट पैकेज नहीं लेता था। लेकिन कंपनियों की आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण समाज और कंपनियों (दोनों) का पतन हुआ। जैसा कि चीन में सरकारी नेटवर्क काम करता है। गूगल वहां चलता ही नहीं है। वहां की सरकार तय करती है कि किस तरह की सामग्री नेट पर अपलोड की जानी चाहिए। अपने देश में भी इन दो विषयों पर विचार करना बहुत जरूरी है। 


2. व्यक्तिगत आयकर में आपकी सरकार के नए नियमों के मुताबिक यदि किसी व्यक्ति की आय 5 लाख रुपए तक की है, तो उस पर कोई टैक्स नहीं है, यह एक अच्छा निर्णय है, लेकिन जिनकी आय 5 लाख रुपए से ज्यादा है, उनको 2 लाख पचास हजार रुपए तक की छूट है। उसके ऊपर पांच लाख तक 5 प्रतिशत, 5 से 10 लाख तक 20 प्रतिशत और 10 लाख से ऊपर 30 प्रतिशत टैक्स है एवं कुछ अतिरिक्त भार है। इसमें यदि संशोधन करके ढाई लाख की छूट को चार लाख तक किया जाए, 4 लाख से 8 लाख तक 5 प्रतिशत, 8 से 15 लाख तक 10 प्रतिशत, 15 से 36 लाख तक 20 प्रतिशत एवं 36 लाख के ऊपर तक की आय पर 30 प्रतिशत टैक्स किया जाए एवं अतिरिक्त भार 1 करोड़ रुपए की आय के ऊपर ही लगाया जाए तो आयकरदाताओं की संख्या में काफी इजाफा होगा। 


3. शेयर बाजार को चलाने के लिए डिविडेंड डिस्ट्रिब्यूशन टैक्स को कम किया जाए। व्यक्तिगत या भागीदारी व्यापार पर तो एक बार टैक्स लगता है, लेकिन कंपनियों के मामले में यह तीन बार लगा दिया गया है। इसे तुरंत प्रभाव से ठीक कराया जाना चाहिए। कंपनियां जो पैसा कमाती है उस पर टैक्स देने के बाद वह पैसा कंपनियों के खाते में ही रहता है, शेयर होल्डर जो कि एक तरह से भागीदार ही होते हैं, उनको उनका हिस्सा डिविडेंड के रूप में वितरित किया जाता है, लेकिन उस पर शासन द्वारा डिविडेंड डिस्ट्रिब्यूशन टैक्स के रूप 17.85% पुन: लिया जा रहा है और व्यक्तिगत रूप में भी यदि किसी की डिविडेंड आय 10 लाख रुपए से ज्यादा है तो उस पर पुन: तीसरी बार 11.40% टैक्स लिया जा रहा है। यही नहीं, कई बार एक कंपनी दूसरी कंपनी में शेयर होल्डर रहती है तो जितनी बार भी डिविडेंड दिया जाएगा उतनी बार डिविडेंड डिस्ट्रिब्यूशन टैक्स लगेगा। यह प्रणाली पूरी तरह से गलत है। डिविडेंड टैक्स के रूप में सरकार को टैक्स बहुत ही कम मिलता है और उसमें भी सरकारी कंपनियों का हिस्सा ज्यादा होता है। किसी भी टैक्स को हटाया तो नहीं जा सकता, इसलिए इसे तुरंत प्रभाव से कम किया जाना चाहिए इसको करीबन 5% रखा जाए एवं व्यक्तिगत तौर पर भी जो 10 लाख रुपए से ज्यादा डिविडेंट प्राप्त होने पर टैक्स लगाया गया है उसे भी कम करके 5% किया जाना चाहिए, चाहे उसकी सीमा 10 लाख रुपए से घटाकर 5 लाख रुपए कर दी जाए। अगर इस नियम को लागू करते हैं तो शेयर मार्केट वापस अपनी पुरानी स्थिति में आ जाएगा।  ऐसा किया जाता है तो कंपनियों के पास जो बहुत सारा पैसा रिजर्व में पड़ा है वह पैसा डिविडेंड के रूप में भागीदारों के पास (जो कि आम जनता भी है) आएगा और बाजार में खर्च बढ़ेगा। वहीं, बैंकों में कंपनियों का जो पैसा पड़ा है और उस पर बैंकों को ब्याज देना पड़ रहा है वह बोझ भी हल्का होगा। इसकी घोषणा से पहले सरकारी वित्तीय संस्थाओं द्वारा शेयर मार्केट में खरीदी कर ली जानी चाहिए ताकि सरकार को एक बड़ा फायदा वहां से भी मिल सके।


4. सीएसआर फंड : कंपनियों को उनके मुनाफे का कुछ प्रतिशत पैसा इस फंड में रखना पड़ता है, जो कि लोक भलाई के काम में खर्च करने के लिए होता है, जिसमें से 8 अगस्त को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ कुमार मंगलम बिड़ला ग्रुप से मध्यप्रदेश में 100 हाईटैक गोशाला बनाने के लिए प्रारंभिक मंजूरी लेकर आए हैं। ऐसा बहुत सारा फंड कंपनियों के पास पड़ा है, जिसे अभी जो बाढ़ और सूखे के कारण पूरे देश में नुकसान हो रहा है उसकी भरपाई के लिए योजनाबद्ध तरीके से खर्च किया जाना चाहिए, लेकिन यह काम बेरोजगार युवाओं द्वारा कराया जाना चाहिए, जिसमें कि मशीनों का कम से कम इस्तेमाल हो। पूर्व में भी 10 जून और 9 अगस्त को मेरे द्वारा कुछ सुझाव आपके समक्ष प्रेषित किए गए हैं। कृपया देश हित में इन सुझाव पर जरूर ध्यान दें।